
दुनिया की राजनीति में एक अजीब सा विरोधाभास अक्सर दिखता है. जो नेता सबसे ज़्यादा शांति की बात करते हैं,
उन्हीं के दौर में अक्सर सबसे ज़्यादा मिसाइलें उड़ती दिखाई देती हैं.
मिडिल ईस्ट की जंग और Iran में बढ़ती मौतों के बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर Donald Trump को नोबेल पीस प्राइज मिल जाता, तो ‘शांति’ शब्द ही इस्तीफा दे देता.
शांति के नाम पर बारूद
वैश्विक राजनीति में अक्सर “पीस” एक ऐसा शब्द बन जाता है जिसे भाषणों में सजाया जाता है और जमीन पर मिसाइलों के बीच खो दिया जाता है. मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष में United States, Israel और Iran तीनों के दावे अलग हैं लेकिन तस्वीर एक ही है आसमान में धुआं और जमीन पर खामोशी.
नोबेल और राजनीति का रिश्ता
Nobel Peace Prize दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित शांति सम्मान माना जाता है. लेकिन क्या यह पुरस्कार हमेशा वास्तविक शांति के लिए दिया जाता है या कभी-कभी यह भी राजनीतिक कूटनीति का हिस्सा बन जाता है.

जंग का असली चेहरा
मिडिल ईस्ट की लड़ाई में असली नुकसान किसी एक नेता का नहीं होता. मरते सैनिक हैं उजड़ते शहर हैं और सबसे ज्यादा टूटती हैं आम लोगों की जिंदगी. जब मिसाइल गिरती है तो उसे फर्क नहीं पड़ता कि सामने सैनिक है या स्कूल से घर लौटता बच्चा.
युद्ध से आजतक किसी को कुछ नहीं मिला
दुनिया ने जितने भी युद्ध देखे उसमें हार जीत भले किसी की हुई हो लेकिन इंसानियत हमेशा हारी है. इतिहास गवाह है जीतने वालों ने जब भी ठन्डे दिमाग से सोचा तो यही पाया कि असल में कुछ हासिल नहीं हुआ. और आज हमारे ट्रम्प साहेब अलग ही जोन में हैं उनके दिमाग में शांति की भाषा और युद्ध की वास्तविकता एक साथ चल रही होती है. और कहना ठीक होगा की “अगर शांति को सच में सब कुछ देखना पड़े
तो वह भी राजनीति से दूरी बना ले.”
दुनिया को किस चीज़ की जरूरत है
मिडिल ईस्ट का संकट यह याद दिलाता है कि सच्ची शांति पुरस्कारों से नहीं आती. वह आती है कूटनीति से संवाद से और उन फैसलों से
जिनमें मिसाइलों से ज्यादा इंसानों की कीमत समझी जाए. और ये बात ट्रम्प को पता ही नहीं है.
